“नए दौर की राजनीति का चेहरा? सलीम सारंग पर टिकी सबकी नजर”

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राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में इन दिनों एक नाम सियासी गलियारों में तूफान की तरह गूंज रहा है — सलीम सारंग। संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष, मौलाना आज़ाद आर्थिक विकास महामंडल के निदेशक और मुस्लिम वेलफेयर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे अहम पदों पर सक्रिय सारंग को विधान परिषद का टिकट देने की चर्चा अब सिर्फ अटकल नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक फैसले की आहट मानी जा रही है।

अगर पार्टी यह दांव खेलती है, तो यह सिर्फ एक उम्मीदवार की घोषणा नहीं होगी—यह एनसीपी की भविष्य की राजनीति, उसकी दिशा और उसके संदेश को तय करने वाला निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। अंदरखाने चल रही बैठकों और चर्चाओं ने इस मुद्दे को और भी गर्म कर दिया है।

सलीम सारंग की ताकत सिर्फ उनका पद नहीं, बल्कि उनकी ज़मीन से जुड़ी राजनीति है। वर्षों से उन्होंने बिना शोर-शराबे के समाज के हर तबके में काम किया है—गरीबों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य शिविर, छात्रों को मदद, आपदा के समय राहत और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने की पहल। यही वजह है कि उनकी छवि “नेता नहीं, बल्कि जनता का अपना आदमी” के रूप में उभरी है 

आज की राजनीति में जहां इमेज बिल्डिंग पर करोड़ों खर्च होते हैं, वहीं सारंग ने अपने काम से पहचान बनाई है। यही उन्हें बाकी नेताओं से अलग खड़ा करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का साफ मानना है कि उनकी उम्मीदवारी एक मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकती है—खासकर अल्पसंख्यक वोट बैंक में भरोसा मजबूत करने और ग्रामीण-शहरी संतुलन साधने में।

सारंग की सबसे बड़ी ताकत उनकी साफ-सुथरी छवि, विवादों से दूरी और शांत लेकिन प्रभावी नेतृत्व शैली है। वह उन नेताओं में गिने जाते हैं जो बोलते कम और काम ज्यादा करते हैं। ऐसे समय में जब राजनीति में भरोसे का संकट गहराता जा रहा है, सारंग एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में उभरते हैं।

एनसीपी इस वक्त संगठन को फिर से खड़ा करने और अपनी पकड़ मजबूत करने के मिशन पर है। ऐसे में सलीम सारंग जैसे जमीनी और लोकप्रिय नेता को आगे लाना “समावेशी राजनीति” का मजबूत संदेश होगा। इससे न सिर्फ नए मतदाता जुड़ेंगे, बल्कि पार्टी की छवि भी जनता के बीच और मजबूत होगी—खासतौर पर मुंबई और राज्य के अन्य अहम क्षेत्रों में।

जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में भी जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। एक ही बात सुनने को मिल रही है—“ये नेता हमारे बीच का है, हमारे लिए लड़ने वाला है।” यही भावना किसी भी संगठन को नई ऊर्जा देने के लिए काफी होती है।

अब असली सवाल यह है कि क्या पार्टी पारंपरिक समीकरणों में उलझी रहेगी या एक नए, मजबूत और भरोसेमंद चेहरे पर दांव खेलेगी? सलीम सारंग की उम्मीदवारी सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक समावेश और नए दौर की शुरुआत का संकेत बन सकती है।

अगर उन्हें मौका दिया जाता है, तो यह एनसीपी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। लेकिन अगर इस मौके को नजरअंदाज किया गया, तो यह एक ऐसी चूक होगी, जिसकी गूंज लंबे समय तक सियासत में सुनाई दे सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम पर आखिरी फैसला सुनेत्रा पवार और उनके बेटे, राज्यसभा सांसद पार्थ पवार के कंधों पर टिका है। यह उनके लिए सिर्फ एक निर्णय नहीं, बल्कि नेतृत्व की असली परीक्षा है—क्या वे निष्ठा और जमीनी काम को प्राथमिकता देंगे या फिर सियासी दबाव के आगे झुकेंगे?

आने वाले नगर परिषद चुनाव इस फैसले को और अहम बना देते हैं। यह मौका है—अपनी पकड़ मजबूत करने का, संगठन को नई दिशा देने का और यह साबित करने का कि पार्टी में मेहनत और निष्ठा की कद्र होती है।

अब सबकी नजरें एक ही फैसले पर टिकी हैं—क्या सलीम सारंग को मिलेगा मौका, या फिर राजनीति एक बार फिर पुराने रास्ते पर लौटेगी?

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