लातूर:रफ़्तार हिंदुस्तान की

लातूर जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक चुनाव को लेकर चल रहे घमासान में भरत तुकाराम चामले को बड़ी कानूनी जीत मिली है। बॉम्बे हाईकोर्ट की छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ ने लातूर जिला बैंक की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद विरोधी खेमे में खलबली मच गई है।
साजिश के तहत खारिज किया गया था नामांकन?
जिला बैंक के निदेशक मंडल चुनाव में भरत चामले ने ‘बीज प्रक्रिया सहकारी संस्था’ और ‘अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)’ कोटे से अपनी दावेदारी ठोकी थी। बैंक में संस्था का लेनदेन न होने का बहाना बनाकर चुनाव निर्णय अधिकारी ने चामले का पर्चा अवैध घोषित कर दिया था। इस फैसले के पीछे राजनीतिक दबाव और साजिश के आरोप लगे थे। चामले बिना झुके इस अन्याय के खिलाफ अदालत पहुंचे और आखिरकार हाईकोर्ट ने बैंक के मंसूबों पर पानी फेर दिया।
नाम की दहशत या राजनीतिक द्वेष?
सहकार जगत में लातूर जिला बैंक को अक्सर ‘देशमुख घराने’ के प्रभाव वाली संस्था माना जाता है। ऐसे में बिना किसी बड़े सियासी खानदान के, जमीनी स्तर पर काम करने वाले और अजित पवार समर्थक भरत चामले का पर्चा खारिज कराने के पीछे कांग्रेस नेताओं की क्या मंशा थी? सहकार क्षेत्र में अब खुलेआम चर्चा है कि सत्ताधारियों को चामले की जीत और उनके जनाधार का डर सता रहा था।
किसान हितैषी छवि ने बढ़ाई धड़कनें:
स्व. रामचंद्र पाटील तलेगांवकर खरीद-बिक्री संघ के जरिए सहकारिता में पारदर्शिता का मिसाल कायम करने वाले भरत चामले एक स्वतंत्रता सेनानी के बेटे हैं। नाफेड के कई पुरस्कारों से सम्मानित चामले ने हमेशा किसानों के हक की लड़ाई लड़ी है।
हाईकोर्ट के इस फैसले से चामले की उम्मीदवारी बरकरार रहने के बाद अब चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। लातूर जिला बैंक की यह चुनावी जंग अब बेहद दिलचस्प और आक्रामक मोड़ पर पहुंच गई है।








