हसद की आग
(समाजी बिगाड़ और इंसानी रिश्तों की तबाही का एक जायज़ा)

इंसानी समाज प्रेम, भाईचारे, सहानुभूति और पारस्परिक सम्मान की बुनियाद पर खड़ा होता है। लेकिन जब दिलों में हसद, द्वेष और नफ़रत जन्म लेती है, तो यही समाज अशांति, अविश्वास और आपसी दुश्मनी का शिकार हो जाता है। हसद एक ऐसी अंदरूनी बीमारी है जो न सिर्फ इंसानी रूह को नष्ट करती है, बल्कि उसके सामाजिक संबंधों और खानदानी रिश्तों को भी खोखला कर देती है। पवित्र क़ुरआन और हदीसों में हसद की कड़ी निंदा की गई है, क्योंकि यह इंसान को भलाई और सदाचार से दूर करके बुराई और फसाद की ओर ले जाती है।
हसद क्या है?
हसद उस भावना का नाम है जिसमें कोई व्यक्ति दूसरे को मिली हुई नेमत, सम्मान, धन या कामयाबी देखकर यह इच्छा करता है कि वह नेमत उससे छिन जाए। यह भावना हकीकत में अल्लाह तआला की तक़सीम पर असंतोष और अपनी कमियों से ग़फ़लत का परिणाम होती है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“हसद नेकियों को उसी तरह खा जाती है, जैसे आग लकड़ी को खा जाती है।”
हसद हकीकत में ऐसी आग है जो सबसे पहले हसद करने वाले के दिल को जलाती है, फिर उसके माध्यम से पूरे समाज में नफ़रत और फसाद फैलाती है।
बेवजह दुश्मनी और नफरत…
जब हसद दिल में जगह बना लेती है, तो इंसान दूसरों की कामयाबी को बर्दाश्त नहीं कर पाता। इस का अंजाम वह बिना किसी वजह दुश्मनी का शिकार हो जाता है। कई बार सामने वाले ने कोई नुकसान भी नहीं पहुँचाया होता, लेकिन उसकी तरक़्क़ी, इज्जत या लोकप्रियता ही हसद करने वाले के लिए ना काबिले बर्दाशत बन जाती है।
यह बेवजह की दुश्मनी इंसान को इंसाफ, अखलाक और सज्जनता से दूर कर देती है। वह हर समय दूसरों को नीचा दिखाने और उनके खिलाफ साजिश रचने में लगा रहता है।
वैयक्तिक दुश्मनी का ज़हर….
हसद की आग बढ़ते-बढ़ते व्यक्तिगत शत्रुता का रूप ले लेती है। छोटे-छोटे मतभेद निजी दुश्मनी में बदल जाते हैं। लोग एक-दूसरे की अच्छाइयों को नज़रअंदाज़ करके केवल कमियाँ ढूँढ़ने लगते हैं।
आज अनेक परिवारों, संस्थाओं और संगठनों में जो विवाद दिखाई देते हैं, उनकी जड़ में अक्सर व्यक्तिगत द्वेष और हसद ही होती है। इससे न केवल व्यक्ति प्रभावित होते हैं, बल्कि सामूहिक प्रगति भी रुक जाती है।
विचारों में मतभेद और सहनशीलता का अभाव….
मतभेद एक स्वाभाविक और सकारात्मक बात है। संसार में कोई दो व्यक्ति पूरी तरह एक जैसे विचार नहीं रखते। लेकिन जब मतभेद के साथ हसद जुड़ जाता है, तो सहनशीलता समाप्त हो जाती है।
फिर व्यक्ति दलील और संवाद के बजाय अपमान, तिरस्कार और आरोप-प्रत्यारोप का रास्ता अपनाता है। वह हर उस व्यक्ति को अपना विरोधी समझने लगता है जिसकी राय उससे भिन्न हो। इस प्रकार समाज में वैचारिक अव्यवस्था और नफ़रत का वातावरण पैदा होता है।
आपसी रंजिश और दिलों की दूरी….
हसद दिलों को एक-दूसरे से दूर कर देती है। छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव पैदा होते हैं और वर्षों तक समाप्त नहीं होते। परिवारों में संबंध-विच्छेद, मित्रों के बीच अविश्वास और पड़ोसियों में नफ़रत की एक बड़ी वजह हसद और अहंकार ही है।
जब दिल साफ़ नहीं रहते, तो प्रेम, सच्चाई और विश्वास समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप लोग बाहरी रूप से साथ रहते हैं, लेकिन उनके दिलों के बीच दूरियाँ बढ़ती जाती हैं।
रिश्तों में दरार….
रिश्ते विश्वास, त्याग और प्रेम के आधार पर टिके रहते हैं। हसद इन सभी आधारों को कमज़ोर कर देती है। कई बार भाई-भाई के विरुद्ध, बहन-बहन के विरुद्ध और निकट संबंधी एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं।
विरासत के मामले, व्यापारिक साझेदारियाँ और पारिवारिक विषय अक्सर हसद और लालच के कारण विवादों में बदल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति दूसरों की खुशी को अपनी असफलता समझने लगे, तो रिश्तों में दरार आना निश्चित हो जाता है।
धन- दौलत का घमंड…
धन और दौलत अल्लाह तआला की प्रदान की हुई नेमत हैं, लेकिन जब यही घमंड का कारण बन जाएँ, तो इंसान दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। धन का अहंकार हसद को जन्म भी देता है और उसे बढ़ाता भी है।
कुछ लोग अपनी आर्थिक स्थिति के कारण दूसरों को कमतर समझते हैं, जबकि कुछ लोग दूसरों की तरक्की देखकर हसद में पड़ जाते हैं। दोनों ही प्रवृत्तियाँ सामाजिक संतुलन को बिगाड़ देती हैं।
इस्लाम ने धन को मानव सेवा और ईश्वर के प्रति शुक्र अदा करने का माध्यम बनाया है, न कि अहंकार और दिखावे का।
सम्मान और बड़प्पन की तीव्र इच्छा…
मानव स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह हर जगह अपनी श्रेष्ठता और बड़प्पन चाहता है। जब सम्मान और बड़प्पन पाने की इच्छा सीमा से आगे बढ़ जाती है, तो व्यक्ति दूसरों का सम्मान सहन नहीं कर पाता।
वह चाहता है कि हर प्रशंसा उसी को मिले, हर सफलता का केंद्र वही हो और हर सभा में उसी की चर्चा हो। यह प्रवृत्ति हसद को जन्म देती है और व्यक्ति को अहंकार, खुद पसंदी तथा दूसरों के अपमान की ओर ले जाती है।
वास्तविक सम्मान अल्लाह तआला के हाथ में है। जो व्यक्ति विनम्रता, आजिज़ी और मानव सेवा को अपनाता है, अल्लाह उसे लोगों के दिलों में स्थान प्रदान करता है।
हसद के दुष्परिणाम….
हसद के अनेक दुष्परिणाम हैं:
दिल का सुकून समाप्त हो जाता है।इबादतों का प्रभाव कम हो जाता है।नेक कर्म नष्ट होने लगते हैं।समाज में नफ़रत और अशांति फैलती है।रिश्ते कमज़ोर हो जाते हैं।व्यक्ति निरंतर मानसिक तनाव में रहता है।अल्लाह की नेमतों पर शुक्रगुज़ारी की भावना समाप्त हो जाती है।
हसद से बचने के उपाय….
अल्लाह की तक़सीम पर संतुष्ट रहना।दूसरों की सफलता पर प्रसन्न होना।शुक्र गुजारी की आदत विकसित करना।विनम्रता और सादगी अपनाना।अपनी कमियों के सुधार पर ध्यान देना।दूसरों के लिए भलाई की भावना रखना।
क़ुरआन की तिलावत और अल्लाह के ज़िक्र का नियमित अभ्यास करना।
हसद एक ऐसी आग है जो सबसे पहले हसद करने वाले को ही जलाती है और फिर आहिस्ता आहिस्ता पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेती है। बेवजह दुश्मनी, व्यक्तिगत वैमनस्य, मतभेदों की तीव्रता, आपसी रंजिशें, रिश्तों में दरार, धन का घमंड और सम्मान व श्रेष्ठता की अनुचित इच्छा—ये सब उसी आग की लपटें हैं।
यदि हम एक शांतिपूर्ण, प्रेमपूर्ण और एकजुट समाज चाहते हैं, तो हमें अपने दिलों को ईर्ष्या, द्वेष और नफ़रत से पाक करना होगा तथा प्रेम, क्षमा, उदारता और परोपकार को अपनाना होगा। यही इस्लामी शिक्षाओं की मांग है और यही सफल जीवन का मार्ग है।
✍️ म. मुस्लिम कबीर, लातूर









